देहरादून: उत्तराखंड के भैरव गढ़ी को 'गढ़वाल का रक्षक' माना जाता है और उनकी पूजा की जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि माना जाता है कि भैरव गढ़ी मंदिर में विराजित भगवान भैरव की कृपा से एक बार गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों पर दुश्मन का हमला नाकाम हो गया था। करीब 235 साल पहले इन क्षेत्रों पर नेपाल के गोरखाओं ने हमला किया था और वे इस युद्ध में पराजित हो गए थे।
गढ़वाल की संस्कृति में प्राचीन मंदिरों और किलों का महत्वपूर्ण स्थान है। इन्ही में से एक 'भैरव गढ़ी मंदिर' है, जो कि पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गांव में स्थित है। भैरव गढ़ी मंदिर न सिर्फ एक प्राकृतिक स्थल है, बल्कि इसका महत्वपूर्ण इतिहास भी है। कहा जाता है कि इस मंदिर का इतिहास गढ़वाल के राजाओं से जुड़ा है। मान्यता है कि यहां आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मंदिर में लोगों से दर्शन करने की अपील की है।
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक वीडियो पोस्ट किया है। इसमें उन्होंने लिखा है, 'पौड़ी गढ़वाल जिले के कीर्तिखाल गांव में मौजूद भैरव गढ़ी मंदिर, कुदरती खूबसूरती से भरे पहाड़ों के बीच है। भगवान भैरव को गढ़वाल का रक्षक माना जाता है। पौड़ी गढ़वाल जिले में आने पर इस पवित्र मंदिर के दर्शन जरूर करें।'
कीर्तिखाल गांव के भैरव गढ़ी मंदिर को लंगूर गढ़ी भी कहा जाता है। यह समुद्र तल से करीब 2400 मीटर (9000 फीट) की ऊंचाई पर है। यह एक खूबसूरत पहाड़ी चोटी पर बना हुआ प्रसिद्ध धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है। भैरव गढ़ी मंदिर गढ़वाल के 52 गढ़ों (किलों) में से एक (लंगूर गढ़) माना जाता है। इतिहास के अनुसार, 18वीं शताब्दी के अंत (सन 1791 के आसपास) और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में नेपाल के गोरखाओं ने गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों पर हमला किया था। गोरखाओं ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण लंगूरगढ़ को जीतने के लिए करीब दो साल तक घेराबंदी की थी। हालांकि युद्ध शुरू होने के बाद सिर्फ 28 दिनों के भीतर ही गोरखा सेना को पराजय का सामना करना पड़ा था।
इस युद्ध में भैरवनाथ के चमत्कार और शक्ति से प्रभावित होकर गोरखा सेना के एक अधिकारी (थापा) ने मंदिर में लगभग 40 किलोग्राम का एक ताम्र पत्र (तांबे की प्लेट) चढ़ाई थी। तभी से इस क्षेत्र में भैरव गढ़ी को 'गढ़वाल के रक्षक' के रूप में पूजा जाने लगा।
मान्यता है कि यहां के कालनाथ भैरव को काली चीजें पसंद हैं। इसलिए यहां मंडुए (रागी) के आटे से बनी रोटी (जिसे 'रोट' कहा जाता है) का प्रसाद चढ़ाया जाता है। हर साल जून के महीने (ज्येष्ठ मास) में यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके अलावा सावन के महीने में भी मंदिर परिसर में विशेष कीर्तन और भंडारे चलते हैं।