नई दिल्ली: विदेश मंत्रालय के उस स्पष्टीकरण को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है, जिसमें कहा गया कि पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है और इसे नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला, जबकि सरकार ने पलटवार करते हुए कहा कि यह कोई नई व्यवस्था नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही कानूनी स्थिति है।
हाल ही में विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा को सुगम बनाना है। मंत्रालय के अनुसार, किसी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण नागरिकता कानूनों और संबंधित नियमों के तहत होता है, जबकि पासपोर्ट एक आधिकारिक यात्रा दस्तावेज है। इस स्पष्टीकरण के बाद विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि अगर पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो आम नागरिक अपनी भारतीय नागरिकता कैसे साबित करेगा।
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार पर निशाना साधते हुए पूछा कि यदि आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी और पासपोर्ट को भी नागरिकता का पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जा रहा है, तो आखिर नागरिक किस दस्तावेज को अपनी राष्ट्रीयता का सबूत मानें।
विपक्ष के आरोपों के बीच सरकार के सूत्रों ने साफ किया है कि पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण न मानने की कानूनी स्थिति कोई नई नहीं है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह फैसला न तो कल लिया गया और न ही पिछले 12 वर्षों में। सरकार का कहना है कि पासपोर्ट कभी भी भारतीय नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं रहा है।