नई दिल्ली: भारत में पहली डिजिटल जनगणना का आगाज हो गया। एक अप्रैल 2026 की आधी रात से इसकी शुरुआत हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, गृह मंत्री अमित शाह ने जनगणना 2027 में हिस्सा लिया। उन्होंने फॉर्म भरा और स्वगणना का काम पूरा किया। यह 16वीं राष्ट्रीय जनगणना है। आजादी के बाद ये 8वीं जनगणना है, जिसमें पारंपरिक कागजी तरीकों की जगह मोबाइल ऐप्स और एक वेब-आधारित सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह कवायद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जनगणना 2027 भारत की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना है। इसे जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत दो फेज में संचालित किया जा रहा है।
मिजोरम पूर्वोत्तर क्षेत्र का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसने भारत की जनगणना 2027 के लिए प्रारंभिक कार्य शुरू कर दिया है। यह प्रक्रिया बुधवार को आधिकारिक तौर पर शुरू हुई। हालांकि, लद्दाख जैसे बर्फ से ढके इलाकों के लिए यह जनगणना अक्टूबर 2026 में शुरू होगी। ये डिजिटल जनगणना क्यों है अनोखी, जानें 5 कारण।
क्यों अनोखी है ये डिजिटल जनगणना
1. खुद जानकारी भरना (Self-Enumeration): नागरिक अपने मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करके इस खास पोर्टल पर लॉग इन कर सकते हैं। फिर अपनी जानकारी ऑनलाइन इसमें भर सकते हैं। यह सुविधा उनके इलाके में घर-घर जाकर सर्वे शुरू होने से 15 दिन पहले खुल जाती है।
2. मोबाइल ऐप्स: लगभग 30 लाख फील्ड कर्मचारी 16 भाषाओं वाले मोबाइल ऐप (Android/iOS) के जरिए डेटा इकट्ठा करेंगे।
3. जियो-टैगिंग: पहली बार, सटीकता और बेहतर प्लानिंग के लिए सभी इमारतों को डिजिटल लेआउट मैपिंग (DLM) का इस्तेमाल करके जियो-टैग किया जाएगा।
4. शुभंकर: सरकार ने जनगणना के समावेशी स्वरूप को दर्शाने के लिए दो शुभंकर प्रगति (महिला) और विकास (पुरुष) पेश किए हैं।
5. लिव-इन कपल्स: जनगणना पोर्टल के FAQ पर गौर करें तो इसमें लिव-इन कपल्स के लिए भी डेटा का जिक्र है। इसमें वो कपल्स आ सकते हैं जो अपने संबंधों को स्थिर मानते हैं, उन्हें विवाहित के रूप में गिना जाएगा।
गृह मंत्रालय के अधीन, भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त (RGI) इस पूरी प्रक्रिया की देखरेख कर रहे हैं। सभी व्यक्तिगत डेटा जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत सुरक्षित हैं। यह सुनिश्चित किया जाता है कि यह डेटा गोपनीय रहे। इसे RTI के माध्यम से साझा न किया जा सके और न ही इसे कानूनी साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।
देशभर में जनगणना दो मुख्य चरणों में की जाएगी, जिसके लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹11,718.24 करोड़ के बजट को मंजूरी दी है।
इसमें नागरिकों की आवास की स्थिति, घरेलू सुविधाओं और संपत्तियों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसमें गणना करने वाले 33 विशिष्ट प्रश्न पूछेंगे, जिनमें भवन निर्माण सामग्री से लेकर इस्तेमाल किए जाने वाले अनाज के प्रकार और स्मार्टफोन जैसे गैजेट्स के स्वामित्व तक की जानकारी शामिल होगी।
इस फेज में व्यक्तियों की जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक जानकारी दर्ज की जाएगी।
डिजिटल जनगणना का मतलब है कि सरकार राष्ट्रीय डेटा इकट्ठा करने के लिए कागजी फॉर्म का इस्तेमाल करना छोड़ रही है। इसके बजाय, वह भारत के हर घर और हर व्यक्ति के बारे में जानकारी रिकॉर्ड करने के लिए मोबाइल ऐप, टैबलेट और एक वेब पोर्टल का इस्तेमाल करेगी। एक नागरिक के तौर पर, इस बदलाव के कई व्यावहारिक मतलब हैं।
सबसे बड़ा बदलाव ये है कि खुद से अपनी जानकारी देना यानी सेल्फ-एन्यूमरेशन। पहली बार, आपको अपनी जानकारी देने के लिए किसी सरकारी अधिकारी के आपके घर आने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। आप अपने मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करके आधिकारिक सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल पर लॉग इन कर सकते हैं।
अपनी जानकारी ऑनलाइन जमा करने के बाद, आपको एक यूनिक सेल्फ-एन्यूमरेशन ID (SE ID) मिलेगी। जब जनगणना करने वाला अधिकारी आपके घर आएगा, तो आप बस उसे यह ID दिखा दें, और वह तुरंत आपके डेटा को वेरिफाई कर लेगा। अगर आप खुद से जानकारी देना नहीं चुनते हैं, तो भी जनगणना करने वाला अधिकारी आपके घर आएंगे।
हालांकि, भारी-भरकम रजिस्टर ले जाने के बजाय, ये अधिकारी आपके जवाब रिकॉर्ड करने के लिए अपने स्मार्टफोन पर एक सुरक्षित मोबाइल ऐप का इस्तेमाल करेंगे। यह ऐप 16 भाषाओं में काम करता है और अगर इंटरनेट कनेक्शन न हो, तो यह डेटा को ऑफलाइन भी स्टोर कर सकता है।
ये डेटा शुरू से ही डिजिटल होता है, इसलिए इसे बाद में कंप्यूटर में मैन्युअल रूप से टाइप करने की जरूरत नहीं पड़ती। जानकारी लगभग तुरंत ही एक सेंट्रल सर्वर पर अपलोड हो जाती है। सॉफ्टवेयर में गलतियों या डुप्लीकेट एंट्री को पकड़ने के लिए पहले से ही जांच-पड़ताल करने वाले सिस्टम मौजूद होते हैं, ताकि टाइप करते समय ही उन्हें ठीक किया जा सके।
सरकार को उम्मीद है कि वह पिछले साल की तुलना में इस बार आबादी का फाइनल डेटा कहीं ज्यादा तेजी से जारी कर पाएगी, जिससे उन्हें स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी योजनाओं की बेहतर ढंग से योजना बनाने में मदद मिलेगी।
इस डिजिटल जनगणना के शुरुआती नतीजे साल 2027 के आखिर तक आने की उम्मीद है। इस डेटासेट का एक बड़ा हिस्सा उसी साल जारी किया जा सकता है। पूरी तरह से डिजिटल फॉर्मेट में बदलने से डेटा इकट्ठा करने में लगने वाला समय काफी कम हो गया है। वहीं पिछली कागजी जनगणनाओं में यह काम पूरा होने में 2-3 साल लग जाते थे।