नई दिल्ली: संसद में मनरेगा को खत्म करने को लेकर चल रही गरमा-गरम बहस के बीच इस मामले में एक्सपर्ट की चौंकाने वाली प्रतिक्रिया सामने आई है। मनरेगा (MGNREGA) को खत्म करने की तैयारी पर सोशल ऐक्टिविस्ट ने चिंता जताई है। निखिल डे और अरुणा रॉय जैसे ऐक्टिविस्ट का कहना है कि अगर ऐसा हुआ तो 'काम के अधिकार' का अंत हो जाएगा। उनका मानना है कि मनरेगा गरीबों को काम की गारंटी देता है, जिससे वे मुश्किल समय में भी अपना गुजारा कर पाते हैं।
सोशल एक्टिविस्ट के मुताबिक, 'सरकार जो नया कानून ला रही है, वह ठीक नहीं है। इसमें सरकार ने खुद यह तय करने का अधिकार ले लिया है कि यह योजना कहां लागू होगी। यह उन सुझावों जैसा है जो कहते हैं कि योजना को सिर्फ कुछ ही इलाकों में चलाया जाए।' 'नरेगा संघर्ष मोर्चा' नाम के एक्टिविस्ट ग्रुप ने इस नए प्रस्ताव को 'सुधार नहीं, बल्कि दशकों की मेहनत से मिले लोकतांत्रिक और संवैधानिक हकों पर हमला' बताया है। उनका कहना है कि सरकार एक ऐतिहासिक अधिकार-आधारित कानून को खत्म करने की कोशिश कर रही है।
निखिल डे, अरुणा रॉय और जीन ड्रेज, सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य रह चुके हैं। इस काउंसिल ने यूपीए सरकार के समय में नीतियों को बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। इन लोगों ने मनरेगा को बनाने में भी खास योगदान दिया था।
डे और रॉय का कहना है कि अगर राज्यों को योजना के 40% खर्च का बोझ उठाना पड़ा, तो यह मनरेगा का अंत होगा। इससे गरीब लोग बुरी तरह प्रभावित होंगे, जो इस योजना पर निर्भर हैं। उन्होंने तर्क दिया कि राज्यों के पास पहले से ही पैसों की कमी है, इसलिए वे इस योजना को चलाने में हिचकिचाएंगे। मनरेगा इसलिए सफल रहा क्योंकि केंद्र को इसके लिए राज्यों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा।
निखिल डे ने कहा कि यह योजना देश के लिए बहुत मददगार साबित हुई है। उन्होंने कहा कि 2008 के आर्थिक संकट और कोरोना महामारी जैसी मुश्किलों में इसने ग्रामीण गरीबों को जीवित रहने में मदद की। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिस पर सरकारें संकट के समय में हमेशा भरोसा कर सकती हैं, क्योंकि यह सभी नागरिकों तक पहुंचने का एक तरीका प्रदान करती है।
डे ने यह भी बताया कि मनरेगा पूरे देश में लागू था। इसमें वही लोग काम चुनते थे जिन्हें काम की जरूरत होती थी। यह 'बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे)' वाले ढांचे से अलग था, जिसमें लोगों को शामिल करने या बाहर रखने में दिक्कतें आती थीं।