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मसूरी लंढौर पर ‘साइलेंट क्राइसिस’, 200 साल पुराना बाजार धराशायी की कगार पर, वैज्ञानिक रिपोर्ट के दबे पन्नों में क्या?.

 
  • Vivek Mishra
  • 29 Nov 2025
  • 1066
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 मसूरी: पहाड़ों की रानी मसूरी इन दिनों एक ऐसी ‘साइलेंट क्राइसिस’ से जूझ रही है, जिसकी आवाज धीरे-धीरे तेज होती जा रही है। जोशीमठ में भू-धंसाव की भयावह तस्वीरें अभी स्मृति से मिट भी नहीं पाई थीं कि अब मसूरी का 200 साल पुराना लंढौर बाजार भी उसी राह पर चलता दिख रहा है।

दो वर्षों में करीब एक फुट धंसी सड़क, मकानों में फैलती दरारें और लगातार हो रहीं दुर्घटनाओं ने यहां की जिदगी को अनिश्चितता से भर दिया है, लेकिन उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि वैज्ञानिक संस्थाओं की रिपोर्टें तैयार होने के बाद भी जनता से क्यों छिपाई जा रही हैं। यह सवाल अब मसूरी की जनता के दिल में शक की रेखाएं गहरा रही हैं।

जमीन नहीं, भरोसा भी धंस रहा है

लंढौर बाजार की सड़क पर चौड़ी दरारें साफ दिखाती हैं कि समस्या सतही नहीं, बल्कि जमीन के भीतर कुछ गंभीर चल रहा है। दुकानदार संदीप अग्रवाल, मनोज अग्रवाल, प्रदीप गुनसोला, अखिलेश रावत और कई अन्य बताते हैं कि धंसाव दो साल से जारी है, लेकिन पिछले महीनों में तो जमीन मानो नीचे भाग रही है। प्रशासन को जगाने के लिए क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार है? स्थानीय लोगों के मुताबिक, अवैध खुदाई और अनियोजित निर्माण ने पहाड़ की स्थिरता को कमजोर किया है, लेकिन शिकायतें फाइलों में दबी पड़ी हैं।

वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट दी, लेकिन सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? सबसे बड़ा सवाल यही है। आईआईटी रुड़की, वाडिया इंस्टीट्यूट और कई अन्य विशेषज्ञ एजेंसियों ने पिछले कुछ वर्षों में इलाके का निरीक्षण किया, लेकिन रिपोर्ट न सार्वजनिक हुई, न किसी ठोस कदम का ऐलान हुआ। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि जानकारी छिपाने का यह रवैया जोशीमठ जैसी त्रासदी के रास्ते को ही आसान बना देता है। यह चुप्पी कहीं प्रशासन की असहज सच्चाई तो नहीं छिपा रही? क्या रिपोर्टें स्थिति की गंभीरता उजागर कर सकती हैं, इसलिए उन्हें दबाया जा रहा है? जनता के बीच ऐसे सवाल तेजी से तैर रहे हैं।

भू-धंसाव, भूस्खलन दोधारी तलवार बन रहा मसूरी का भूगोल

हाल की अतिवृष्टि के दौरान झड़ीपानी में हुए बड़े भूस्खलन ने साफ कर दिया है कि मसूरी के कई हिस्सों में लैंडस्लाइड जोन हैं। ऊपर से लंढौर बाजार को भूकंप क्षेत्र-4 की मार भी झेलनी पड़ रही है। विशेषज्ञ चेताते हैं कि धंसाव को इस चरण में न रोका गया, तो बाजार का मूल स्वरूप बचा पाना बेहद कठिन होगा।
 

प्रशासनिक प्रतिक्रिया, वादों से आगे कार्रवाई कब?

नगरपालिका अध्यक्ष मीरा सकलानी ने दावा किया है कि आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट को डीएम से मिलकर चर्चा की जाएगी। कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी भी इसे प्राथमिकता पर ले चुके हैं, लेकिन लंढौर के लोग कहते हैं कि निरीक्षण तो हर साल होते हैं, लेकिन समाधान कब होगा? धंसाव जहां प्रतिदिन आगे बढ़ रहा है, तो वहीं कार्रवाई फाइलों और बैठकों के बीच फंसी है।
 

200 वर्ष पुरानी धरोहर, अब पहचान बचाने की जंग

ब्रिटिश काल में सैनिकों के लिए बने इस पुराने बाजार के लिए आज असली चुनौती है कि क्या यह आने वाली पीढ़ियों में बचा भी रहेगा? लंढौर केवल एक बाजार नहीं, मसूरी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है। दरकती दीवारें, टेढ़ी सड़कें और खाली होती दुकानें अब यह कहानी कह रही हैं कि समय बहुत कम बचा है। अंतिम सवाल, लंढौर का भविष्य किसके हाथ में? क्या प्रशासन रिपोर्टें सार्वजनिक करेगा? क्या अवैध खुदाई पर रोक लगेगी, क्या वैज्ञानिक आधार पर स्थिरीकरण प्लान तैयार होगा या फिर मसूरी भी जोशीमठ की तरह आपदा के बाद सरकार जागने की परंपरा दोहराएगी? स्थानीय जनता कह रही है कि रोकथाम अभी होगी, तभी लंढौर बचेगा। वरना इतिहास के नक्शे से एक बाजार और मिट जाएगा।

 

 
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