लखनऊ: उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की मुखिया मायावती लंबे वक्त बाद लखनऊ में रैली करने जा रही हैं। रैली का आयोजन बीएसपी के संस्थापक कांशीराम के निर्वाण दिवस यानी 9 अक्टूबर को लखनऊ के कांशीराम स्मारक पार्क में हो रहा है। मायावती इस आयोजन के जरिए जनता का नब्ज टटोलने की कोशिश करती दिख रही है। उनकी रणनीति कुछ इसी प्रकार के संकेत दे रही है। दरअसल, कांशीराम स्मारक पार्क के चयन को अलग नजरिए से देखा जा रहा है। इस पार्क की क्षमता करीब एक लाख है। ऐसे में इस पार्क में रैली के जरिए वे अधिक से समर्थकों के जुटने की उम्मीद तो कर रही हैं। हालांकि, घटते वोट प्रतिशत और जनाधार को देखते हुए उनकी रणनीति के पीछे के उद्देश्यों पर चर्चा तेज हो गई है।
बहुजन समाज पार्टी ने लखनऊ में 9 अक्टूबर को कांशीराम के निर्वाण दिवस के अवसर पर एक राज्यस्तरीय कार्यक्रम का आयोजन किया है। 1984 में बसपा के गठन के बाद से बहुजन समाज पार्टी अपनी रैलियों के लिए जानी जाती रही है। हर रैली के बाद बसपा मजबूत होती रही है। इन रैलियों के जरिए बसपा अपने नेताओं को सामने लाती रही है। जमीनी नेताओं को राज्य और राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचाने में बसपा और उसके कैडर का बड़ा योगदान रहा है। हालांकि, पिछले एक दशक में पार्टी ने जमीन पर पकड़ के साथ पार्टी के बड़े नेताओं को भी खोया है।
वर्ष 1995 में मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद बसपा अपनी हर सरकार में बड़ी रैली का आयोजन करती रही है। वर्ष 2007 से 2012 की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद 2012 में हुए चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को सत्ता गंवानी पड़ी। अखिलेश यादव ने बहुमत से समाजवादी सरकार बना ली । 2012 की हार के बाद से लगातार बहुजन समाज पार्टी चुनाव हारती रही है। चाहे वह लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का चुनाव।
लोकसभा चुनाव 2019 में जरूर समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बाद बसपा को एकमुश्त मुस्लिम वोट मिला। बसपा 10 सांसदों को जिताने में सफल रही। लेकिन, यूपी चुनाव 2022 में बसपा को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। पार्टी को केवल एक सीट पर संतोष करना पड़ा, जबकि वोट प्रतिशत भी गिरकर 12 प्रतिशत के आसपास रह गया।
2024 के लोकसभा चुनाव में 10 सांसद वाली बसपा एक बार फिर लोकसभा में शून्य पर खड़ी हो गई। 2012, 2017, 2019, 2022 और 2024 की चुनावी हार से बसपा का मूल मतदाता भी शिफ्ट होने लगा। बहुजन समाज पार्टी अपने उस वोट प्रतिशत पर पहुंच गई है, जहां से शुरू हुई थी। 1989 में बसपा को लगभग 12 प्रतिशत वोट और एक दर्जन विधायक और दो सासंद उत्तरप्रदेश से जिताने में सफलता मिली थी। मगर आज बसपा लोकसभा में शून्य और विधानसभा में एक विधायक की पार्टी बन गई है।
बसपा की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले यूपी के राजनीतिक विश्लेषक सैयद कासिम कहते हैं कि पार्टी सुप्रीमो मायावती ने 2027 में पार्टी को वापस लाने के लिए और अपने कोर वोटर को विश्वास दिलाने के लिए लखनऊ में कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस पर लखनऊ में अपनी ताकत दिखाने का फैसला किया और राज्यस्तरीय कार्यक्रम की घोषणा कर दी। बहुजन समाज पार्टी की सरकार में बनाए गए रमाबाई अंबेडकर मैदान की जगह कांशीराम स्मारक में कार्यक्रम करने की घोषणा से सवाल पैदा हुआ कि मायावती ने रैली स्थल रमाबाई क्यों नहीं रखा।
दरअसल, बहुजन समाज पार्टी ने अपने समस्त रैलियां सरकार में रहते आयोजित की और सरकार में की गई रैली को कामयाब बनाने के लिए विधायक मंत्री, सांसद सभी व्यवस्था कर देते थे। वर्तमान समय में बसपा के साथ केवल उनका कैडर है, न कोई विधानसभा प्रत्याशी, न ही बड़ा नेता पार्टी में बचा है।
सैयद कासिम कहते हैं कि मायावती जानती हैं कि उनका मूल कार्यकर्ता दलित समाज के जाटव समाज से आता है। उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वो बस की व्यवस्था कर सके। इसलिए, मायावती ने केवल टेस्टर लगाने के लिए मैदान का चयन किया। कांशीराम स्मारक की क्षमता 1 लाख लोगों की है। अगर बसपा इस मैदान को भरने में सफल हो गई तो मायावती 2027 चुनाव से पहले बकायदा रैली की घोषणा कर सकती हैं। इससे 2027 चुनाव से पहले बड़ा शक्ति प्रदर्शन दिखाया जा सके।
बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल से जब मैदान के बारे में सवाल किया तो उनका कहना था ये कोई रैली तो है नहीं। 5 लाख लोग अपने मसीहा के परिनिर्वाण दिवस पर इकट्ठा होंगे। इसे हमारी नेता संबोधित करेंगी। इसीलिए इस कार्यक्रम का नाम भी रैली नहीं रखा गया है।
बसपा की 9 अक्टूबर की रैली को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बसपा इसमें अपनी ताकत को मापने की तैयारी में है। साथ ही, यह लोगों को अपनी ताकत दिखाने का माध्यम भी होगा। बसपा की 9 अक्टूबर के कार्यक्रम की घोषणा के बाद समाजवादी पार्टी के कान भी खड़े हो गए है। भाजपा भी रैली पर नजर बनाए हुए है। ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद की ओर से बसपा मायावती और आकाश आनंद के लिए जिस तरह तारीफ भरे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, वह सीएम योगी आदित्यनाथ को भी चौंका रहा है।