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जंगली जानवरों के आतंक पर धामी सरकार का बड़ा फैसला, उत्तराखंड में जान गंवाने पर मिलेगा 10 लाख रुपये का मुआवजा.

 
  • Abhishek Shukla
  • 03 Oct 2025
  • 1098
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देहरादून: उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में बढ़ोतरी को देखते हुए प्रदेश सरकार ने जंगली जानवरों के हमले में जान गंवाने वाले लोगों के परिवार के लिए मुआवजे की धनराशि बढ़ाकर 10 लाख रुपए कर दी है। देहरादून में वाइल्डलाइफ वीक के शुभारंभ के मौके पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मुआवजा राशि बढ़ाने की घोषणा की।

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से चला रहा है। ऐसे संघर्षों में कई लोगों की जान चली जाती है तो कई लोग गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार को राज्य सरकार द्वारा मुआवजा राशि दी जाती है। यह मुआवजा राशि समय-समय पर बढ़ाई भी गई है। अब तक यह धनराशि 6 लाख रूपये थी जिसे बढ़ाकर सीधा 10 लाख रुपए कर दिया गया है।

देहरादून जू में वाइल्डलाइफ वीक के उद्घाटन के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि वन्यजीव हमारी आस्था, संस्कृति और परंपरा का अभिन्न अंग हैं, हमारे देवी-देवताओं ने भी इनके साथ सह-अस्तित्व का संदेश दिया है। आदिकाल से वन्यजीवों का संरक्षण भारत की जीवन पद्धति का स्वाभाविक हिस्सा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य की लगभग 14.77 प्रतिशत भूमि, 6 राष्ट्रीय उद्यानों, 7 वन्यजीव विहारों और 4 संरक्षण आरक्षित क्षेत्रों के रूप में संरक्षित है, जबकि पूरे देश में ये अनुपात मात्र 5.27 प्रतिशत ही है। ये अंतर हमारे राज्य की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता का स्पष्ट प्रमाण है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार के सामूहिक प्रयासों से बाघ, गुलदार, हाथी, हिम तेंदुवे जैसे दुर्लभ वन्य प्राणियों की संख्या में उत्साहजनक वृद्धि हुई है। परंतु इनके साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। इस संघर्ष को कम करने के लिए सरकार आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक उपायों का उपयोग कर रही है।

वन विभाग को ड्रोन और जीपीएस की तकनीकी सुविधा दी जा रही है, ताकि वन्यजीवों की निगरानी और सुरक्षा और बेहतर ढंग से हो सके। स्थानीय लोगों के लिए आजीविका के नए अवसर पैदा किए जा रहे हैं, ताकि वे जंगलों की रक्षा और वन्यजीवों की सुरक्षा में सक्रिय भागीदार बन सकें।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने एक लाख युवाओं को ’’सीएम यंग ईको-प्रिन्योर’’ बनाने की बात कही थी, अब ये स्कीम रंग ला रही है। इस स्कीम के अंतर्गत नेचर गाइड, ड्रोन पाइलट, वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर, ईकोटूरिज्म, वन्यजीव टूरिज्म आधारित कौशल कार्यों को एक उद्यम के रूप में परिवर्तित किए जाने की दिशा में काम आगे बढ़ चुका है।

उत्तराखंड में देखें तो इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव की संख्या सबसे ज्यादा है। पर्वतीय इलाकों में लोग गुलदार और भालू के हमलों से परेशान हैं। सरकारी आंकड़ों की मानें तो विगत 25 वर्षों में 1250 से ज्यादा लोग वन्य जीवों से संघर्ष में मारे जा चुके हैं। जबकि 6000 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इन 25 वर्षों में गुलदार के हमले में 539 लोगों की जान गई है, जबकि भालुओं के हमले में 67 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। गुलदार और भालू के हमले में लगभग 4000 लोग घायल हुए हैं।

पर्वतीय इलाकों में खेती करने वाले लोगों के लिए गुलदार और भालू बड़ा खतरा बने हुए हैं। पिछले दिनों पौड़ी के पैठानी क्षेत्र में एक भालू का इतना आतंक हो गया कि उसे शूट करने के आदेश दिये गये हैं। इस भालू ने तीन दर्जन से अधिक जानवरों को गौशाला में घुसकर मार डाला। यहां तक कि अभी भी यह भालू वन विभाग की पकड़ में नहीं आया है। इस हिंसक भालू से ग्रामीणों के लिए भी खतरा उत्पन्न हो गया है जिसके चलते वन विभाग ने भालू को शूट करने के आदेश दिए हैं।

वहीं मानव-वन्यजीव संघर्ष में जान गंवाने वालों के लिए मुआवजा राशि बढ़ाने की हर बार मांग उठती रही है जिस पर इस बार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बड़ा कदम उठाया है। वर्ष 2024 में यह मुआवजा राशि 3 लाख थी जिसे बाद कर 6 लाख किया गया था। वन्य जीवों के हमले में घायल होने वालों को मिलने वाली राशि पर कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।

बंदरों, भालू और गुलदार के आतंक के कारण लोग अब खेती नहीं कर पा रहे हैं। ग्रामीण घरों और गांव को छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं। वहीं वन्य जीव विशेषज्ञों का कहना है कि मुआवजा बढ़ाने के साथ-साथ जंगलों से सटे गांव में वन्यजीवों से सुरक्षा के उपाय जागरूकता अभियान भी जरूरी है।

 

 
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