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31 साल बाद भी गूंज रही हैं 2 सितंबर 1994 की वो चीखें,मसूरी गोलीकांड की यादें, उत्तराखंड आंदोलनकारियों की पीड़ा और अधूरे सपने.

 
  • Shubham Sehgal
  • 03 Sep 2025
  • 1019
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मसूरी/देहरादून: आज जब उत्तराखंड अपने अस्तित्व के 25 साल पूरे कर चुका है, तब एक दर्दनाक तारीख फिर से जेहन में दस्तक देती है 2 सितंबर 1994 यह वो दिन था, जब मसूरी की शांत वादियां गोलियों की आवाज़ से कांप उठी थीं। उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें 6 आंदोलनकारी 2 महिलाएं और 4 पुरुष शहीद हुए थे। इस बर्बर कार्रवाई में एक पुलिस अधिकारी की भी जान गई थी।
 

1994 का मसूरी गोलीकांड आंदोलन की आग में धधका था उत्तराखंड

उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग 1970 के दशक से ही उठती रही थी, लेकिन 1990 के दशक में यह आंदोलन उग्र रूप लेने लगा। 2 सितंबर 1994 को मसूरी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों पर जो गोलीबारी हुई, वह किसी लोकतांत्रिक देश में होने वाली सामान्य घटना नहीं थी। पुलिस ने आंदोलनकारियों को निशाना बनाकर फायरिंग की, जिससे कई घायल हुए और 6 ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। शहीदों के नाम आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं, लेकिन उनके परिवार और साथी आज भी पूछते हैं, क्या यह बलिदान व्यर्थ गया? 2 सितंबर 1994 को जिन माताओं ने अपने बेटों को खोया, जिन बहनों ने भाई गंवाए, जिन बच्चों ने पिता को जाते देखा, उनकी आंखों में आज भी एक ही सवाल है, क्या हमारा बलिदान सिर्फ किताबों की एक लाइन बनकर रह जाएगा?

राज्य आंदोलनकारी आज भी पहाड़ का पानी, जवानी और पलायन रोकने की मांग लगातार कर रहे हैं। राज्य आंदोलनकारी पूरण जुयाल ने बताया कि खटीमा गोलीकांड के विरोध में 2 सितंबर 1994 को आंदोलनकारी मसूरी में जुलूस लेकर उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति के कार्यालय झूलाघर जा रहे थे। इसी दौरान गनहिल की पहाड़ी से किसी ने पथराव कर दिया, जिससे बचने के लिए आंदोलनकारी कार्यालय में जाने लगे। इसी बीच पुलिस ने आंदोलनकारियों पर गोलियां चला दीं। गोलीकांड में राज्य आंदोलनकारी मदन मोहन मंमगाई, हंसा धनाई, बेलमती चौहान, बलवीर नेगी, धनपत सिंह, राय सिंह बंगारी शहीद हो गए थे। साथ ही सेंट मैरी अस्पताल के बाहर पुलिस के सीओ उमाकांत त्रिपाठी की भी मौत हो गई थी। पुलिस द्वारा कई आदोलकारियों को जेल में डाल कर उनके साथ बबरता की गई।

2000 में मिला उत्तराखंड, लेकिन खो गए आंदोलन के असली सिपाही

9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य बना। लाखों उत्तराखंडवासियों ने उस दिन को एक नई सुबह माना, लेकिन क्या यह वास्तव में उन हजारों आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तराखंड बना? आंदोलनकारियों के सपने थे कि पहाड़ के लोगों को रोजगार, महिलाओं की भागीदारी, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य, पलायन पर रोक, युवाओं को मौका, भ्रष्टाचार से मुक्त शासन, लेकिन 25 साल बाद भी जब पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, युवा नौकरी के लिए तरस रहे हैं, तब ये सवाल उठता है कि क्या शहीदों के सपनों को पूरा किया गया?

राज्य आंदोलनकारी बोले, ठगे गए हम, सिर्फ रस्मी श्रद्धांजलि नहीं चाहिए

आज जब मसूरी गोलीकांड को 31 साल हो चुके हैं। राज्य आंदोलनकारी खुद को उपेक्षित और अपमानित महसूस कर रहे हैं। हर साल सरकारें श्रद्धांजलि देती हैं, पर यह श्रद्धांजलि फोटो खिंचवाने तक सीमित रहती है। आंदोलनकारियों की पीड़ा है कि राज्य आंदोलनकारी पेंशन बहुत सीमित लोगों को मिली, उसमें भी भ्रष्टाचार की शिकायतें, कई शहीदों के परिवार अब भी आर्थिक संकट में जी रहे हैं।

कई आंदोलनकारियों को राज्य आंदोलनकारी का दर्जा तक नहीं मिला। युवाओं को नहीं पता आंदोलन की असली कहानी, सरकारी पाठ्यक्रमों में कोई उल्लेख नहीं, आंदोलनकारियों के नाम पर स्मारक, संग्रहालय अधूरे या अनुपस्थित, हमने उत्तराखंड मांगा था, नौकरशाही नहीं। शहीदों के परिजन और साथी आंदोलनकारी कहते हैं कि हमने एक ऐसा उत्तराखंड चाहा था, जहां आम जनता की भागीदारी हो, लेकिन आज का उत्तराखंड राजनीति और नौकरशाही की जकड़ में है। जो लोग कभी आंदोलन के खिलाफ थे, वे आज सत्ता में हैं। और जो सड़कों पर लाठी खा रहे थे, वे आज दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।
 

सरकारों की घोषणाएं बनकर रह गईं भाषणों की बातें

उत्तराखंड की अब तक रहीं सरकारें चाहे वह कांग्रेस की रही हों या बीजेपी की हर बार मसूरी गोलीकांड को याद तो किया, लेकिन कोई स्थायी नीति नहीं बनाई गई। आंदोलनकारियों के कल्याण के लिए शहीदों के नाम पर स्थायी स्मारक या संस्थान की स्थापना नहीं हो सकी। सरकारी योजनाओं में आंदोलनकारियों को प्राथमिकता नहीं दी गई।
 

आंदोलनकारियों की मांगें

राज्य आंदोलनकारियों की कुछ मुख्य मांगें हैं। सभी पात्र आंदोलनकारियों को मान्यता और पेंशन, शहीदों के नाम पर स्कूल, कॉलेज या सरकारी भवन, हर जिले में आंदोलन स्मारक और संग्रहालय, स्कूल पाठ्यक्रम में उत्तराखंड आंदोलन का समावेश, आंदोलन में घायल या पीड़ित परिवारों को स्वास्थ्य और आर्थिक सहायता दी जाए।

 

 
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