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जातिवाद हो या सांप्रदायिकता... समाज में जो भी गलत है उसका विरोध होना चाहिए.

 
  • Uttarakahdn Byte Desk
  • 23 Aug 2025
  • 1325
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‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ और ‘समर शेष है’ जैसी प्रसिद्ध रचनाओं के लेखक व मशहूर हिंदी साहित्यकार अब्दुल बिस्मिल्लाह की इसी हफ्ते राजकमल प्रकाशन से नई किताब आई है ‘स्मृतियों की बस्ती’। शोभा अक्षर ने उनसे साहित्य की स्मृतियों और उसके वर्तमान पर लंबी बातचीत की। पेश हैं प्रमुख अंश...

आज जब न केवल सांप्रदायिकता बल्कि जातिवाद भी प्रबल है, धर्मनिरपेक्षता और प्रतिरोध को बढ़ावा देने में अपनी और अन्य साहित्यकारों की क्या भूमिका देखते हैं?
दूसरों की तो नहीं, लेकिन मेरा प्रयत्न रहा है कि जो कुछ भी गलत है, समाज में उसका प्रतिरोध होना चाहिए। चाहे वह जातिवाद हो या सांप्रदायिकता। मेरी रचनाओं में इन्हें देखा जा सकता है। आज के रचनाकारों को मैं पढ़ता रहता हूं, वे भी प्रयत्न कर रहे हैं। इसके बावजूद मैं हमेशा यह महसूस करता हूं कि शिद्दत के साथ किसी चीज को उठाना है, जिससे एक हलचल-सी पैदा हो, उसकी कमी मुझे नजर आती है। यह भी शायद समय की देन है। निस्संदेह रचनाकार का तो यही कर्तव्य है, बल्कि धर्म है उसका कि जो कुछ भी गलत है उसके विरोध में खड़ा होना।

दूसरा पहलू यह भी है कि वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक जो माहौल है, उसका साहित्यिक स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ रहा है?
जिस परिवेश में हम जी रहे होते हैं, वह हमें प्रभावित करता ही है। खुले शब्दों में कहूं तो हां, एक तरह से भय का वातावरण है। ऐसा नहीं कि यह जो भय का वातावरण है, पहले नहीं था। सवाल यह है कि हम उस वातावरण में कैसे खुद को आगे लेकर आते हैं और कैसे हम उससे जूझते हैं। यह एक बहुत बड़ा बिंदु है। साहित्य और अन्य सारी कलाएं जो हैं, उनकी स्वतंत्रता धीरे-धीरे सीमित हो रही हैं, क्योंकि सब कुछ सीमित होता चला जा रहा है।

आपने तो सेंसरशिप का भी समय देखा है, ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ के लिए व्यापक आलोचना आपने झेली और देखी है...
सेंसरशिप शब्द आ गया है तो मैं तो उस जमाने की बात कर रहा हूं जब वाकई कानूनी तौर पर सेंसरशिप लगा था। 1975-76 के दौरान जब इमरजेंसी लागू की गई थी। मुझे एक कवि की याद है, और तो कोई मुझे याद नहीं है। हिंदी के कवि बाबा नागार्जुन, जिन्होंने अपनी एक कविता सुनाई थी उस दौरान पटना के चौराहे पर खड़े होकर, उनको गिरफ्तार कर लिया गया।

आप 1984 में दिल्ली आए। आपने हाल में कहीं लिखा है कि ‘दिल्ली जो है वह अक्षरों का नहीं, संख्याओं का शहर है।’ ऐसा क्यों?
यह बात तो खैर मैंने एक खास संदर्भ में कही है। जो अक्षर हैं और जो संख्या है- इन दोनों शब्द की व्यंजना में अगर हम जाएं तो संख्याएं हमें गणित की तरफ ले जाती हैं और अक्षर हमें विचार और हृदय की तरफ ले जाते हैं। मैं हमेशा कहता हूं कि विज्ञान हमारे मस्तिष्क को विकसित करता है लेकिन साहित्य केवल मस्तिष्क तक सीमित नहीं है। वो हृदय में जाता है। एक समय था जब पूरे देश के लोग रोजी-रोटी की तलाश में कलकत्ता जाया करते थे। उस जमाने में कलकत्ता को विदेश तक कह दिया गया, ‘बिदेसिया’ लिखा गया। दिल्ली में गणित अधिक चलता है, मस्तिष्क से काम चलता है। एक घटना याद आती है। दिल्ली में मैं नया-नया आया था तो ऐसे ही एक बस स्टॉप पर खड़ा था। साथ में एक मित्र थे जो सहायक अध्यापक के पद पर नए आए थे। उनकी दिल्ली में ही पढ़ाई-लिखाई हुई थी, मैं बनारस से आया था। वहां एक व्यक्ति अचानक गिर पड़ा। जैसे ही वो गिरा, मैं उसको उठाने के लिए आगे बढ़ा। लेकिन मेरे साथी ने मेरा हाथ खींच लिया। मुझे कहा कि ऐसा मत कीजिए। मान लीजिए कि इसी बीच पुलिस आ जाती है तो पहले आपको पकड़ कर पूछताछ करेगी। वहां मैं हृदय से काम कर रहा था, पर मेरे मित्र मस्तिष्क से काम ले रहे थे।

हिंदी साहित्य में एक आरोप लगता रहा है कि आलोचकों और समीक्षकों पर पुरुषवादी नजरिया हावी रहता है। इस पर क्या कहेंगे?
आरोप लगाने वाले कुछ भी आरोप लगा सकते हैं। यह भी कह सकते हैं कि आलोचक साहब ने अमुक-अमुक धर्म के लेखकों पर ध्यान नहीं दिया, या अमुक जाति के लेखकों पर कुछ लिखा ही नहीं है! सवाल है कि साहित्य को परखने का मापदंड क्या आलोचना है, या पाठक हैं? हम आलोचकों के भरोसे जिएंगे क्या? क्या हम इसलिए लिख रहे हैं कि आलोचक हमारे बारे में लिखें? एक रचनाकार को इसका इंतजार नहीं करना चाहिए। रचना अगर योग्य होगी तो पाठक उसे अपने आप महत्वपूर्ण बना देते हैं।

आपकी नई कृति ‘स्मृतियों की बस्ती’ आई है। इस बस्ती में प्रेम का कोई अप्रतिम क्षण और किसी दुख की कोई पीड़ा जो अभी भी आपके मन में कौंधती है?
तुलसीदास की एक पंक्ति है - ‘गिरा अनयन नयन बिनु बानी’। आंख जो है वो बोल नहीं पा रही है और वाणी जो है वो देख नहीं पा रही है। इसका मतलब है कि दोनों समर्थ भी हैं और दोनों असमर्थ भी हैं। पर मतलब यह कि दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। देखना भी महत्वपूर्ण है, बोलना भी महत्वपूर्ण है। कोई सिर्फ देखता है तो वह भी महत्वपूर्ण है और सिर्फ बोलता है तो वह भी महत्वपूर्ण है। हमें फर्क करना छोड़ देना चाहिए।

 

 
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