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गंगा के ऊपर झूलता इतिहास...94 साल बाद क्यों बंद हुआ ऋषिकेश का ऐतिहासिक पुल? पढ़ें लक्ष्मण झूला की कहानी.

 
  • Kunal Kataria
  • 11 Apr 2025
  • 878
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नई दिल्ली: अगर आप कभी उत्तराखंड की योग नगरी ऋषिकेश गए हैं, तो आपने वहां लक्ष्मण झूला देखा होगा। ये झूला पवित्र गंगा नदी के ऊपर बना है। लक्ष्मण झूला न सिर्फ एक इंजीनियरिंग का नमूना है, बल्कि यह धार्मिक आस्था और पर्यटन का भी प्रतीक रहा है। आज के ही दिन यानी 11 अप्रैल 1930 को जनता के लिए खोला गया यह 124 मीटर लंबा इस्पात तारों का झूलता पुल अब सुरक्षा कारणों से बंद है। इसके इतिहास से लेकर वर्तमान स्थिति तक, यह खबर लक्ष्मण झूले की पूरी कहानी बयां करती है।

धार्मिक आस्था से जुड़ा है नाम

मान्यता है कि भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने इसी स्थान पर जूट की रस्सियों से बने अस्थायी पुल से गंगा नदी पार की थी। इसी वजह से इस पुल का नाम लक्ष्मण झूला पड़ा। हिंदू धर्म में इसकी गहरी आस्था है, और यह ऋषिकेश आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए विशेष महत्व रखता है। पास ही लक्ष्मण मंदिर भी है, जो इस स्थान की पवित्रता को और बढ़ाता है।

जूट से लोहे तक का सफर

लक्ष्मण झूले का इतिहास 19वीं सदी से शुरू होता है। 1889 में कोलकाता के सेठ सूरजमल झुहानूबाला ने स्वामी विशुदानंद की प्रेरणा से जूट की रस्सियों की जगह लोहे की तारों से मजबूत पुल बनवाया। यह पुल 284 फीट लंबा था, लेकिन 1924 की भीषण बाढ़ में बह गया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने 1927 में नए सिरे से निर्माण शुरू किया। 1929 में पूरा हुआ यह 124 मीटर (450 फीट) लंबा और 6 फीट चौड़ा इस्पात तारों का पुल 11 अप्रैल 1930 को जनता के लिए खोला गया। यह उस समय उत्तर प्रदेश (तब यूनाइटेड प्रोविंस) का पहला सस्पेंशन ब्रिज था, जो जीप जैसे हल्के वाहनों के लिए भी उपयुक्त था।

इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना

लक्ष्मण झूला एक सस्पेंशन ब्रिज है, जिसका कोई आधार स्तंभ (पिलर) नहीं है। गंगा से 70 फीट की ऊंचाई पर यह पुल इस्पात की मोटी तारों और लोहे से बना है। इसका डिजाइन इतना मजबूत था कि यह दशकों तक लाखों लोगों और हल्के वाहनों का भार सहता रहा। इसकी खूबसूरती और झूलने की खासियत ने इसे पर्यटकों के बीच मशहूर बनाया। ‘गंगा की सौगंध’ और ‘सन्यासी’ जैसी फिल्मों की शूटिंग के साथ-साथ टीवी धारावाहिक ‘सीआईडी’ में भी यह पुल नजर आ चुका है।

क्यों बंद हुआ लक्ष्मण झूला?

94 साल की उम्र पूरी करने के बाद लक्ष्मण झूला जर्जर हो गया। 2019 में IIT रुड़की की एक सर्वे रिपोर्ट में इसे आवागमन के लिए असुरक्षित बताया गया। इसके कई हिस्से कमजोर हो चुके थे, और यह बढ़ते यातायात का भार सहने में असमर्थ था। 12 जुलाई 2019 को उत्तराखंड सरकार ने सुरक्षा कारणों से इस पर आवाजाही बंद कर दी। हालांकि, स्थानीय लोगों की मांग पर कुछ समय के लिए पैदल यात्रियों को अनुमति दी गई। लेकिन 3 अप्रैल 2022 को पुल की एक सपोर्टिंग तार टूटने से इसे पूरी तरह बंद करना पड़ा। पास में बन रहे बजरंग सेतु के निर्माण के दौरान मशीनों की टक्कर से तार टूटने की घटना ने खतरे को और बढ़ा दिया।

 

 
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