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एक साथ चुनाव कराना अलोकतांत्रिक नहीं है... नए चेहरों को मौका मिलेगा, कानून मंत्रालय ने ONOE पर संयुक्त पैनल को कही बात.

 
  • Kunal Kataria
  • 25 Feb 2025
  • 880
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नई दिल्ली: केंद्र सरकार 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर गंभीर है। कानून मंत्रालय ने संसद की संयुक्त समिति को बताया है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से लोकतंत्र कमजोर नहीं होगा। ना ही संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचेगा। समिति इस समय 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' से जुड़े विधेयकों पर विचार कर रही है। कानून मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया है कि एक साथ चुनाव कराने से राजनीति में नए चेहरों के लिए रास्ते खुलेंगे। अभी कुछ नेता ही राजनीति पर हावी रहते हैं और अहम पदों पर कब्जा जमा लेते हैं। यह जानकारी संसदीय समिति के सूत्रों ने दी है।

'वन नेशन वन इलेक्शन' पर कानून मंत्रालय ने क्या कहा

यह संसदीय समिति संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024 की जांच कर रही है। मंत्रालय ने समिति के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे। राष्ट्रपति शासन जैसे कई कारणों से यह क्रम टूटा। कुछ सवालों के जवाब चुनाव आयोग से मांगे गए हैं। समिति की अगली बैठक मंगलवार को होगी।

'ONOE संविधान की मूल संरचना के भी खिलाफ नहीं'

सांसदों ने पूछा था कि क्या यह प्रस्ताव संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है? क्या यह संघवाद के खिलाफ है? कानून मंत्रालय ने कहा कि एक साथ चुनाव कराने से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह संविधान की मूल संरचना के भी खिलाफ नहीं है। प्रस्तावित संशोधन नागरिकों के अधिकारों का हनन नहीं करते। नागरिकों के वोट देने और चुनाव लड़ने के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

केशवानंद भारती केस जैसे कई फैसलों का जिक्र

मंत्रालय ने अपने जवाब में केशवानंद भारती केस, एसआर बोम्मई केस, इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण केस जैसे कई अहम फैसलों का हवाला दिया है। यह साबित करने के लिए कि एक साथ चुनाव संविधान की मूल संरचना के खिलाफ नहीं हैं। कानून मंत्रालय के विधायी विभाग ने बताया कि संविधान लागू होने के बाद 1951 से 1967 तक लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए।

समय से पहले भंग हुई विधानसभाएं तो टूटा सिलसिला

पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ था। उसके बाद 1957, 1962 और 1967 में भी यही क्रम जारी रहा। लेकिन 1968 और 1969 में कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग होने से यह सिलसिला टूट गया। चौथी लोकसभा भी 1970 में समय से पहले भंग हो गई और 1971 में नए चुनाव हुए। पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा ने अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

वन नेशन वन इलेक्शन के पक्ष में सरकार

हालांकि, आपातकाल के कारण आर्टिकल 352 के तहत पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल 1977 तक बढ़ा दिया गया था। उसके बाद, केवल आठवीं, दसवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं लोकसभा ने अपना पूरा कार्यकाल पूरा किया। छठी, सातवीं, नौवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं लोकसभा समय से पहले भंग हो गईं।

इसलिए उठ रही ONOE की मांग

राज्यों की विधानसभाओं का भी यही हाल रहा है। समय से पहले विधानसभा भंग होना और कार्यकाल बढ़ाना आम बात हो गई। इन घटनाओं ने एक साथ चुनाव कराने के सर्कल को पूरी तरह से तोड़ दिया। इस वजह से देशभर में चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए, कहा गया कि एक साथ चुनाव होने से शासन में स्थिरता आती है।

कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति ने की सिफारिश

देश के विभिन्न हिस्सों में लगातार चलने वाले चुनावों के कारण, राजनीतिक दल, उनके नेता, विधायक और राज्य, केंद्र सरकारें अक्सर शासन को प्राथमिकता देने के बजाय आगामी चुनावों की तैयारी पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति ने एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश की थी। यही कारण है कि सरकार 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर जोर दे रही है। 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के कई फायदे गिनाए जा रहे हैं।

'बार-बार चुनाव होने से खर्च ज्यादा होता है'

सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि इससे सरकार का ध्यान विकास कार्यों पर केंद्रित रहेगा। बार-बार चुनाव होने से सरकारी मशीनरी चुनावी तैयारियों में ही उलझी रहती है। इससे विकास कार्यों पर असर पड़ता है। साथ ही, बार-बार चुनाव होने से खर्च भी बहुत ज्यादा होता है। 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' से इस खर्च में कमी आएगी। इससे जनता का पैसा बचेगा, जिसका इस्तेमाल विकास कार्यों में किया जा सकता है। इसके अलावा, बार-बार चुनाव होने से आचार संहिता भी लागू होती रहती है। इससे विकास कार्यों में रुकावट आती है। वन नेशन वन इलेक्शन से इस समस्या से भी निजात मिलेगी।

'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के नुकसान पर भी चर्चा

हालांकि, 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के कुछ नुकसान भीकानून मंत्रालय ने कहा कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक समय पर कराना न तो लोकतंत्र के विरुद्ध है और न ही संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाता है। 1951 से 1967 तक ये चुनाव साथ में होते थे। हालांकि, राजनीतिक व्यवस्थाओं के बदलाव से यह चक्र टूट गया।

हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इससे क्षेत्रीय दलों को नुकसान होगा क्योंकि राष्ट्रीय मुद्दे ज्यादा हावी हो जाएंगे। इसके अलावा, अगर किसी राज्य में सरकार समय से पहले गिर जाती है, तो दोबारा चुनाव कराने के लिए क्या व्यवस्था होगी, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, सरकार का कहना है कि इन सभी मुद्दों पर विचार किया जा रहा है और जल्द ही कोई समाधान निकाला जाएगा।

 

 

 
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