नई दिल्ली: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शनिवार को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित किया और देशवासियों को बधाई दी। उन्होंने गणतंत्र बनने के बाद पिछले 75 साल में देश की सर्वांगीण प्रगति की तारीफ करते हुए कहा कि आज भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित कर रही है और ऊंची विकास दर के साथ बड़ी संख्या में लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया है। तीन नए आपराधिक कानूनों की जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने 1947 में आजादी हासिल कर ली थी, लेकिन औपनिवेशिक मानसिकता के कई अवशेष बने रहे जिन्हें बदलने के प्रयास हाल के दौर में दिखे हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले 75 वर्षों में भारत ने एक मजबूत और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाई है। स्वाधीनता के बाद, जब देश में गरीबी और भुखमरी व्याप्त थी, तब भारतीय नागरिकों ने अपने आत्मविश्वास और कठिन श्रम से देश को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास किए। उन्होंने किसानों, मजदूरों और अन्य श्रमिक वर्गों की भूमिका की सराहना की, जिनके संघर्ष और समर्पण से भारतीय अर्थव्यवस्था आज विश्व में महत्वपूर्ण स्थान बना चुकी है।
उन्होंने कहा कि भारत का संविधान हमारे नागरिकों की सामूहिक अस्मिता का प्रतीक है, जिसने देश को एकजुट किया है। संविधान के आधार पर ही भारत में समावेशी विकास को प्रोत्साहन मिला है, जिससे गरीब और वंचित वर्गों को भी विकास के अवसर मिले हैं। विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सरकार ने कई योजनाएं बनाई हैं, जिनसे उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है।
अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रपति ने पिछले एक दशक में सरकार द्वारा किए गए सुधारों की सराहना की, जैसे कि डिजिटल भुगतान और वित्तीय समावेशन के प्रयास, जो व्यापक स्तर पर लोगों को मुख्यधारा में लाने में सफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा किए गए ये सुधार भारतीय जनता को बेहतर जीवन स्तर और अवसर प्रदान करने में मदद कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1947 में हमने स्वाधीनता प्राप्त कर ली थी, लेकिन औपनिवेशिक मानसिकता के कई अवशेष लंबे समय तक विद्यमान रहे। हाल के दौर में, उस मानसिकता को बदलने के ठोस प्रयास हमें दिखाई दे रहे हैं। ऐसे प्रयासों में - इंडियन पीनल कोड, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, और इंडियन एविडेंस एक्ट के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को लागू करने का निर्णय सर्वाधिक उल्लेखनीय है। न्यायशास्त्र की भारतीय परंपराओं पर आधारित इन नए अधिनियमों द्वारा दंड के स्थान पर न्याय प्रदान करने की भावना को आपराधिक न्याय प्रणाली के केंद्र में रखा गया है। इसके अलावा, इन नए कानूनों में महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों पर काबू पाने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।