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जितना रोमांच उससे ज्‍यादा जोखिम, नेपाल सीमा से रास्ता और भी कठिन हो जाता है.

 
  • Alok Bhadoria
  • 26 Oct 2023
  • 1136
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देहरादून/ पिथौरागढ़: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में आदि कैलाश मार्ग पर एक जीप नदी में जा गिरी, उसमें सवार छह लोगों की मौत हो ई। मंगलवार दोपहर हुई इस घटना में मरने वाले चार लोग बेंगलुरु के थे। हादसा धारचूला-गुंजी मोटर मार्ग पर मंगलवार दोपहर हुआ। गर्बाधार के पास आदि कैलाश यात्रियों को ला रही जीप 500 मीटर नीचे काली नदी में गिर गई। हादसे वाली जगह इतनी खतरनाक है कि रेस्क्‍यू भी संभव नहीं था। आदि कैलाश की यात्रा में हर साल हजारों तीर्थ यात्री आते हैं। भगवान शिव की तपोस्थली आदि कैलाश और ओम पर्वत के दर्शन कर लोग खुद को धन्य मानते हैं। लेकिन भोलेनाथ की तपोस्थली का रास्ता बेहद दुर्गम और दुष्कर है।

आदि कैलाश, पार्वती कुंड का रास्ता तय करने के लिए लोग कई-कई दिनों का इंतजार करते हैं। मानसून के दौरान कहीं पूरी की पूरी पहाड़ी दरक कर सड़क पर आ जाती है तो कहीं भूस्खलन के कारण रोड ही गायब हो जाती है। ऐसे में यात्रियों के लिए जितनी मुश्किलें होती हैं उससे कहीं ज्यादा चुनौती स्थानीय प्रशासन, बीआरओ, सेना के लिए होती है। रास्ता बहाल करने के साथ ही यात्रियों को सुरक्षित निकालना उनकी ही जिम्मेदारी होती है।

नेपाल बॉर्डर से रास्‍ता और दुर्गम

इस दुर्गम रास्ते में कई जगह ऐसे स्थान भी हैं जहां संचार सुविधा भी नहीं है। नेटवर्क नहीं होने के कारण मोबाइल नहीं चलते हैं। ऐसे में अगर रास्ते में कहीं कोई दुर्घटना हो जाए तो मुख्यालय तक सूचना पहुंचने में ही समय लग जाता है। इस तरह हादसे के शिकार लोगों के बचने की उम्मीद भी उतनी ही कम हो जाती है। पिछले 20 दिनों के भीतर धारचुला-लिपुलेख मार्ग पर दो हादसे हो चुके हैं जिनमें 12 लोगों की जान चली गई। आदि कैलाश की यात्रा के दौरान पिछले 20 दिनों में हुए दो हादसों में 12 लोगों की मौत यह बताने के लिए काफी है कि यहां का रास्ता बेहद दुर्गम और जानलेवा है। खासकर नेपाल बॉर्डर से आदि कैलाश की यात्रा बेहद दुष्कर हो जाती है। काली नदी लोगों के लिए काल बन रही है। इस मार्ग पर पहले भी कई हादसे हुए हैं जिसमें वाहन सीधे काली नदी में समा जाते हैं।

तीन रास्ते हैं आदि कैलाश के

आदि कैलाश की यात्रा करना तीर्थ यात्रियों के लिए आसान नहीं है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से होकर जाने वाला मार्ग बेहद खतरनाक है। इसके बावजूद यात्रा के लिए हजारों लोग आते हैं। आदि कैलाश तक जाने के लिए तीन रास्ते हैं। इनमें से एक रास्ता भारत के उत्तराखंड से होकर गुजरता है लेकिन इस रास्ते में मुश्किलें ज्यादा है क्योंकि यह रास्ता अधिकतर पैदल और ट्रैकिंग का है। दूसरा रास्ता नेपाल की राजधानी काठमांडू से सीधे कैलाश जाने के लिए है। लेकिन नेपाल सरकार जून से सितंबर माह तक के लिए ही इस रास्ते को खोलती है और तीसरा रास्ता आसान लेकिन सबसे महंगा है जो हवाई यात्रा के द्वारा संभव है। हेलीकॉप्टर के जरिए नेपाल के नेपालगंज से सिमीकोट और हिल्स होकर तकलाकोट तक जाते हैं जहां से आगे की यात्रा वाहन से होती है।

जितना रोमांच है उससे ज्यादा खतरा

आदि कैलाश यात्रा को दुनिया की सबसे दुर्गम लेकिन बेहद सुंदर यात्रा कहा जाता है। यह यात्रा 15 हजार फीट की ऊंचाई से लेकर 19 हजार फीट तक की ऊंचाई तक जाती है। यात्रा में जितना रोमांच है उससे ज्यादा खतरा भी है। इस यात्रा के लिए शरीर के साथ-साथ मन का मजबूत होना भी बेहद जरूरी है।

सरकार उत्‍तराखंड के रास्‍ते ही भेजती है

बेहद दुर्गम यात्रा होने के बावजूद अधिकांश यात्रियों को भारत सरकार उत्तराखंड के रास्ते से आदि कैलाश की यात्रा के लिए भेजती है। उत्तराखंड के हल्द्वानी, कौसानी, बागेश्वर, धारचूला, तवाघाट, पंगु, सिरका,गला,मालपा, बुद्धि, गुंजी, कालापानी, लिपुलेख दर्रा, तकलाकोट, जैदी, बरखा मैदान, तर्जन, डेरा बुक से होकर कैलाश पहुंचा जा सकता है। यह यात्रा भारत सीमा में 14 दिन और चीन सीमा में 13 दिन की है। वहीं, अल्मोड़ा से अस्कोट, खेल, गर्वी, लिपुलेह खिण्ड, तकलाकोट होकर जाने वाला रास्ता ज्यादा मुश्किल है। यह रास्ता 338 मील लंबा है और कई उतार चढ़ाव इस रास्ते में आते हैं। इस मार्ग पर सरलकोट तक 44 मील की चढ़ाई है और उसके बाद 46 मील की उतराई है।

लिपुलेख मार्ग बेहद खतरनाक

इससे पहले पिथौरागढ़ से लिपुलेख मार्ग बेहद खतरनाक है। यहां होने वाले हादसों की जानकारी भी समय से नहीं मिल पाती है क्योंकि इन क्षेत्रों में दूरसंचार की सुविधा नहीं है। लगभग 75 किलोमीटर का रास्ता बेहद दुर्गम है। देखा जाए तो बेहद ऊंची पहाड़ियों के बीच जब हजारों टन का मलबा एक साथ गिरता है तो देखने वालों का दिल दहल जाता है। अगर कोई इस हजारों टन मलबे की चपेट में आ जाए तो उसका बचना मुश्किल है।

हिमालयन रेंज की सबसे खतरनाक रोड

रास्ते से गुजरते हुए जितना रोमांच महसूस होता है उससे कहीं ज्यादा डर मन में बैठा होता है। 12 हजार फीट की ऊंचाई पर 75 किलोमीटर लंबी यह सड़क हिमालयन रेंज की सबसे खतरनाक रोड है। यहां का सफर बेहद दुर्गम है। सड़क के साथ-साथ काली नदी चलती है। अगर कोई वहां यहां से गिर जाए तो सीधे नदी में ही समाता है। 75 किलोमीटर की इस सड़क को बनाने में बीआरओ को 12 साल का समय और 400 करोड़ की लागत लगी है।

संचार सेवा शुरू करने की जरूरत सबसे ज्‍यादा

इस रास्ते पर कब हादसा हो जाए कोई नहीं जानता। यहां से सफर करना बेहद दुष्कर है और आदि कैलाश की यात्रा करने वाले लोग जान हथेली पर रखकर जाते हैं। यहां हादसा हो जाए तो और आगे-पीछे चलने वाला न देखे तो इन हादसों का पता भी न चले। चीन सीमा से जुड़ा होने के कारण यह मोटरमार्ग सेना के लिए बेहद अहम है लेकिन मौत का खतरा हर समय मंडराता रहता है। इस मार्ग पर सबसे ज्यादा जरूरत है संचार सेवा शुरू किये जाने की।

 

 
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