मलेरिया के खिलाफ जंग में दुनिया को एक और शक्तिशाली हथियार मिल गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मलेरिया की दूसरी वैक्सीन R21 को मंजूरी दी है। नाइजीरिया, घाना और बुर्किना फासो पहले ही R21 को मंजूरी दे चुके हैं। भारत में मलेरिया के सर्वाधिक मामले ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में पाए जाते हैं। यह बीमारी हर साल पांच लाख लोगों की जान ले लेती है, जिनमें ज्यादातर छोटे बच्चे होते हैं। ऐसे में यह वैक्सीन बड़ी उपलब्धि है।
- मलेरिया की पहली वैक्सीन RTS,S (मॉस्किरिक्स) को 2021 में उपयोग के लिए मंजूरी दी गई थी। घाना, मलावी और केन्या में 18 लाख बच्चों को यह वैक्सीन दी गई है। साल के अंत तक अफ्रीका के नौ और देशों में इसकी डोज पहुंचने की उम्मीद है।
- पहली वैक्सीन की 1.8 करोड़ डोज दो साल के बीच उपलब्ध होने की उम्मीद है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह डोज मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में हर साल पैदा होने वाले अनुमानित 4 करोड़ बच्चों की रक्षा जरूरत का केवल 10 फीसदी है।
- R21 अगले साल से मार्केट में उपलब्ध हो सकती है। दवा कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट हर साल 10 करोड़ डोज बनाएगी। अगले दो वर्षों में उसकी उत्पादन क्षमता दोगुनी हो जाएगी। इसकी कीमत 166 रुपये से 332 रुपये के बीच होगी।
- RTS,S की तरह, R21 की भी कई प्रारंभिक डोज लेनी पड़ेगी और बाद में बूस्टर भी। दोनों वैक्सीन प्लास्मोडियम परजीवी के प्रोटीन के साथ इम्यूनिटी उत्पन्न करते हैं, जो मलेरिया का कारण बनता है।
- नई वैक्सीन में इम्यूनिटी बढ़ाने वाला एक अलग एजेंट या सहायक होता है, जिसका उत्पादन RTS,S में उपयोग किए जाने वाले एजेंट की तुलना में कुछ हद तक आसान होता है।
- चार अफ्रीकी देशों में 4800 बच्चों पर किए टेस्ट के डेटा से पता चलता है कि ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी और सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की बनाई R21/मैट्रिक्स-M वैक्सीन बीमारी के खिलाफ महत्वपूर्ण सुरक्षा देती है।
- R21 के तीसरे चरण के ट्रायल में माली, बुर्किना फासो, केन्या और तंजानिया में 5 से 36 महीने की उम्र के बच्चों को शामिल किया गया। पिछले साल ट्रायल के अनुसार वैक्सीन का असर 70 फीसदी से ज्यादा था।